थल पर तो चलता ही हूँ.. नभ में भी विचरण कर लिया.. अब बारी थी जल में विचरण की... तो पद्मनाभपुरम घूमने के बाद हम थिर्पाराप्पू (
thirparappu) फाल्स गए... यहाँ सुन्दर झरना भी है और एक झील भी..झील के किनारे झूले भी लगे है...और ये जगह पद्मनाभपुरम से ज्याद दूर भी नहीं..
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| आप घूमने जाए तो मदद मिलेगी... |
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| झील... |
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| आदि का नौका विहार... |
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| जब तक कुछ शरारत न हो तो क्या मजा.. देखो.. पापा कैसे हाथ पकड़ के बैठे है.. |
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| फिर मजा झूले का.. |
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| नकली है तो क्या.. गेंडा तो है.. |
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हाथी.. मेरा फेवरेट..
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अगली कड़ी में विवेकान्द रोक मेमोरियल ले चलूँगा.... फिर मिलते है...
February 17, 2010 at 6:45 PM
गैंडे की सवारी...हा हा!! आदि से तो डर कर हाथी भाग गया फिर गैंडा क्या चीज है. :)
February 17, 2010 at 8:34 PM
अरे वाह...ये तो मजे आ गए आदि को...हुर्रे...
नीरज
February 17, 2010 at 9:09 PM
अच्छा, हाथी पर इस लिये नहीं चढ़े कि असली है!
February 18, 2010 at 12:43 AM
wowwww hero.........khub mje kiye han...
regards
February 18, 2010 at 1:12 AM
क्या बात है बढ़िया झूले , बढ़िया सवारियां ...खास कर गैंडे वाली सवारी...आदि बाबू ऐश हो रही है :)
February 18, 2010 at 1:44 AM
बहुत बढिया आनंद ले रहे हो आदि.
रामराम.
February 18, 2010 at 6:56 AM
आदि को पानी से खेलने में तो बडा मजा आया होगा...और पापा ने कस कर पकड़ रखा था,फिर कैसा डर
February 18, 2010 at 9:17 AM
वाह तुम्हारी फोटो तो बहुत अच्छी खिंची हैं
February 18, 2010 at 9:36 AM
अरे वाह आदि तुम्हे पानी के संग खेलते देख कर एक बार तो मै भी डर गया, फ़िर देखा अरे पापा ने पकड रखा है, बहुत सुंदर चित्र
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