"मिट्टी मिल गई तो मानो स्वर्ग मिल गया...कोई खिलौना, कोई दूसरा खेल,मिट्टी की बराबरी नहीं कर सकता ....उसके आगे टिक ही नहीं सकता। इसलिए मिट्टी में खेलने का कोई भी मौका हम छोड़ते ही नहीं हैं। ऊपर से मम्मा-पापा को कहते हुए भी सुन लिया, 'लागे रज,बधे गज' (कहावत राजस्थानी की है, भावार्थ कुछ ये कि मिट्टी लगने से बच्चा अच्छा बढ़ता है....मिट्टी में खेलना बच्चे के शरीर के लिए अच्छा है.....)"अब मैं चलने लग गया हूँ और समझदार हो गया हूँ (है न?) तो पापा मुझे शाम को पार्क में और झुले पर खेलने के लिये ले जाते हैं.. एसे ही एक दिन शाम को को पापा के साथ गया और मिट्टी में खेलने के मजे लिये..
रेत पर अंगुलियों के निशान बनाये..
निशान फिर से मिटाये..
और खुद ही सुन्दर चित्रकारी का आनन्द लिया..
और खुब रेत उडाई..... धम.. धम्म..
एक और बात जो फोटो में नहीं आ पाई.. वो ये कि बीच में पापा की नजर से बच कर दो बार अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाई.. (आपको जानना है तो इमेल करें.. गुप्त नुस्खा है).. और अपने दातों की मजबुती को भी परखा.. बिल्कुल खरे दांत है मेरे..:)
पसंद आया!!
(शिर्षक विभु दीदी के ब्लोग से साभार)

August 19, 2009 at 6:45 PM
बहुत बढ़िया आदि ! आखिर तुम्हे मिटटी में खेलने के आनंद का पता चल ही गया ! बेटे हम तो बड़े होने के बाद भी मिटटी में खूब खेलते थे ! रेत में खूब लोट-पोट किया करो कपडे गंदे हो तो हो परवाह मत करना ! रेत में खेलने से एलर्जी की प्रितिरोधक क्षमता विकसित है ऐसा तेरे कई डाक्टर अंकल कहते है |
August 19, 2009 at 7:14 PM
ओए चीकू....खेलते रहो..रेत में लकीरें बनाना ही जिन्दगी है!!
August 19, 2009 at 8:31 PM
आदित्य ! खेल खेल में जीवन-दर्शन का स्वाद ले लिया तुमने । यहाँ प्रविष्टि से उसे बाँट भी लिया । जियो !
August 19, 2009 at 8:35 PM
Aadi please tell your papa that he writes really well....you both compliment each other so well!
August 19, 2009 at 9:01 PM
ह्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म यानी की आदि ने पापा से छुप कर मिटटी खाई है न..........नहीं चलेगा ये सब नहीं चलेगा ओके....
love ya
August 19, 2009 at 10:04 PM
khoobsurat pics....bachpan ke din boht khoobsurat hote hai..no tension...
August 19, 2009 at 11:57 PM
बहुत बढिया मेरे शेर. मिट्टी मे खेलेगा तो समझ ले पक्का ताऊ बन जायेगा.:)
रामराम.
August 20, 2009 at 12:21 AM
बस तुम्हारी सूरत देखने आया हूँ..मूड अच्छा करना था इसलिए.....
August 20, 2009 at 1:06 AM
bahut badhiya...ji har kar khelo...bade hokar aisa nahi kar pate log. mann bhi mitti main khoob man se khelta hai.
August 20, 2009 at 1:08 AM
वाह वाह ! मिटटी में खेलना तो हमारा भी प्रिय शौक था... और हमारी अम्मी बताया करती हैं की मैं तो बचपन में मिटटी खा भी लिया करता था...
पर आप ऐसा मत करना....
August 20, 2009 at 1:22 AM
waah mitti se khelne ka maza gazab hai:) aur khane ka bhi:);),mitti khayi thi hai na,aadi baba:):)
August 20, 2009 at 4:41 AM
लगे रहो आदि!
यही तो उम्र है मस्ती करने की।
August 20, 2009 at 4:41 AM
are yaar, ham to diwar me moohn lagakar mitti khaya karte the.
gaawon me milli kee deewaren hoti hain naa.
or usi ka asar hai ki aaj tak koi chhoti-moti bimari nahin hui.
August 20, 2009 at 8:51 AM
" LAGE RAJ, BADHE GAJ " MUBARAK KO AAP KE TANDURASTEE LEKIN BACH KE AADI BHAI
August 20, 2009 at 7:31 PM
शानदार! जियो बरखुरदार!
August 21, 2009 at 1:52 AM
मैंने पूछा मिट्टी से,
मिट्टी ओ मिट्टी, तू गीली क्यों है?
मिट्टी ने कहा मुझसे,
कल रात आदि ने यहां सू सू जो किया था.. :D
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