ये देखो एक चेयर और एक मोबाइल.. और चेयर को पकड़ने के लिये बनी जगह.. और मेरा खेल शुरु...
जगह का मुआयना तो हो गया.. अब लाता हूँ मोबाइल... नजर ’मछली की आँख’ पर
ये गया मोबाइल...
और ये देखो.. बिल्कुल अच्छे से पहुँचा दिया..
और धड़ाम.. मोबाइल.. उस पार..
तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ!!कैसा लगा..





July 24, 2009 at 8:43 PM
भले आदमी, मोबाइल को तोड़ने पर क्यों आमादा है किसी और चीज को ही पार करले !
July 24, 2009 at 8:45 PM
लगता है पक्का खिलाडी है..
July 24, 2009 at 8:47 PM
क्या विवेक अंकल..
आप ही ने तो कहा था
"खिलौना मँहगा हो या सस्ता, एक ही दिन में हो खस्ता"
अब मेरे लिये तो ये भी खिलौना ही है न??
July 24, 2009 at 9:08 PM
" ha ha ha ha ha ha good job hero"
love ya
July 24, 2009 at 9:19 PM
अच्छा हमारा हथियार हमीं पर चला रहे हो ?
ठीक है,ठीक है,
अब झगड़ो मत,
हम जीते, तुम हारे, झगड़ा खत्म !
July 24, 2009 at 9:39 PM
aare waah aadi tho bahut hoshiyaar hai,naye naye games khelta hai waah,khursi bahut bhaa gayi humko cuti master:)
July 24, 2009 at 10:04 PM
चेयरमैन बनो! जिसका काम चेयर पर बैठना, साइन करना और मोबाइल पर ड़ांटना भर होता है! :)
July 24, 2009 at 11:02 PM
bahut khub aadi bhai lage raho |
July 24, 2009 at 11:11 PM
chalo isi bahane aadi kuch der ke lie busy rahegaaaaa. mom to yahi soch rahi hongi...
July 25, 2009 at 1:05 AM
कुर्सी-मोबाईल वाले खेल से बोर हो जाओ तो एक बढिया गेम मैं बताता हूं, अब कुर्सी की जगह पीछे वाली खिड़की हो सकती है। एक बार खिड़की से मोबाईल को नीचे डाल कर देखो कितना मजा आयेगा.... और हां ये बंद वाला डमी मोबाइअल नहीं पापा या मम्मी का मोबाईल डाल कर देखना ।
:)
July 25, 2009 at 4:18 AM
हैल्लो आदि!
भाई मिस-कॉल क्यों दे रहे हो?
बात करो ना।
July 25, 2009 at 4:59 AM
जमीन पर पटको, तब तो टूटेगा. इस तरफ से डालकर गिराओ... :)
क्या मस्ती चल रही है.
July 25, 2009 at 4:59 AM
अरे आदि तुमने तो मेरा नम्बर ही मिला दिया हेलो कैसे हो कल तुम्हारी जलेबियां नहीं खा पायी चलो फिर बाई आशीर्वाद्
July 25, 2009 at 4:59 AM
अरे आदि तुमने तो मेरा नम्बर ही मिला दिया हेलो कैसे हो कल तुम्हारी जलेबियां नहीं खा पायी चलो फिर बाई आशीर्वाद्
July 25, 2009 at 5:01 AM
लगे रहो।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
July 25, 2009 at 6:39 AM
आजकल हम भी इसी तरह की उठापटक कर रहे हैं। लगे रहो।
July 25, 2009 at 8:49 AM
बेटा कभी मौका मिले तो बालकनी के छेद से भी नीचे निकलना मोबइल
July 25, 2009 at 10:35 AM
बहुत अच्छे..लगे रहो यार.
रामराम.
July 26, 2009 at 6:24 PM
ठीक ही तो है खिलौना सस्ता हो महंगा और मोबाइल हो या कुछ और तेरे लिए तो खिलौना ही है उसे बचाने की जिम्मेदारी तेरी थोड़े ही है तू तो खेलता जा जिसे बचानी हो वो चिंता करे |
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