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एक स्टूल कई कारनामें...

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एक छोटा सा स्टूल से घर में.. मेरा one ऑफ द फेवरेट.. फेवरेट इसलिये क्योंकी इससे कई कारनामें अंजाम दे सकता हूँ.. ये पूरा मेरे कंट्रोल में रहता है.. पूरा मतलब पूरा.. इसे उठा सकता हूँ, उल्टा (पटक) सकता हूँ.. इसको लेकर पुरे घर में घूम सकता हूँ.. और इस पर चढ़ अपनी विजयी पताका फहरा सकता हूँ... यकिन नहीं हो रहा न? मत मानो.. पर ये स्लाईड शो देखने के बाद अपना फैसला सुनाना..






वैसे ये हरकते देख पापा ने स्टूल गायब कर दिया है...ताकि अकेले में ये कारनामें न अंजाम दूँ.. अब पता नहीं कब मिलेगा.. आप जरा शिफारिश किजिये..
17 comments:

Comments

हाय आदि कैसे हो? लग तो चकाचक रहे हो? बहुत बढिया.

तेरी इस काम के लिये सिफ़ारिश नही की जा सकती.

रामराम.


िआदि देखो बेटा इस पर चढना नहीं आज मेरी नातिन ऐसे ही स्टूल पर चढी और गिर गयी ध्यान रखना ओ के आशीर्वाद्


आदि ! यह स्टूल गिराने का औजार भी है अतः इसे दिलाने की सिफारिश नहीं की जा सकती |


इसकी सिफारिश कोई नहीं होगी जी आदि जी :) खूब मस्त शैतानी है यह ...संभल कर


हाँ लगता है तुम्हारे लिए यह वाकर का काम करता होगा. जमीन चिकनी है इस लिए उसके सहारे खूब भाग दौड़ भी कर लोगे.(skating) लेकिन याद रखना की उसमे ब्रेक नहीं है. माथा फूट जाएगा.


अरे पलटू तुम तो सरकस के जोकर की तरह से कमाल दिखा रहे हॊ. बहुत सुंदर लेकिन बहुत ध्यान से, कही अभी नये आये दो दांत मत तुड्वा लेना.
ओर हम बिलकुल भी सिफ़ारिश नही करेगे इस बार , बल्कि पापा ने अच्छा किया.
प्यार


चलो यार किसि ने भी तुम्हारे लिये सिफारिश नहीं की में थॊडी सी कर देता हुं. "पापा यही उमर हॆ आदी की शरारत करने की, आप घर आते ही उसे उसका स्टूल दे देना", ऒर उसका ध्यान रखना


आदि तुम्हारी करतूत अच्छी लगीं।
ये शरारत बार-बार देखने को मन करता है।


बिना ट्रेनर के ऐसे करतव नहीं करना चाहिए . वेसे मज़ा बहुत आता होगा यह सब करने में


बहुत बढिया बेटा इस पर चढना नहीं ....


और भी हैं सामाँ, आदित्य प्यारे स्टूल के सिवा
नजर आएंगे जब वे, धूल चाटेगा स्टूल बिचारा।


अरे थोडा ढूंढ़ के लाओ, नहीं तो पापा को पकड़ के मांगो और फिर उनके साथ खेलो इससे. अकेले नहीं :)


दे दो यार आदि को हमारे. खेलेगा बस और कुछ तोड़ेगा नहीं और न ही किसी को परेशान करेगा. है न आदि!! आज दे देंगे पापा मगर बदमाशी में कुछ तोडना मत. :)


खेलो, खेलो, और खूब खेलो.....यही तो दिन हैं मौज-मस्ती के......पर ज़रा संभलकर....

साभार
हमसफ़र यादों का.......


अरे वत्स ' आदि ',
और सब तो ठीक , लेकिन ये मेरा 'सिंहासन' ले के कहाँ गोल हो गए ? ये ही तो मेरे राजसिंहासन का ' सिंहासन ' है !
चलो कोइ बात नहीं , वैसे भी मेरे किसी काम नहीं आ रहा था . वैसे इसपे चढ़ने उतरने उलटने पुलटने दूसरे को उतारने बैठाने में कोई हर्ज़ नहीं है . मज़ेदार काम है . पर खतरा भी हो सकता है. इसलिए अच्छी देखरेख 'गार्जियन शिप ' में ही करना .
दिल्ली के 'बाबा' लोग भी ऐसा ही करते हैं !
खूब सारे आशीस . तुमने मन मोह लिया .
नज़र न लगे .
chasm e baddoor !!


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