समस्या गंभीर थी, जल्द समाधान चाहती थी... मम्मी ने सुझाया आदि के लिये कुछ भारी बॉल लाई जाये जो कम तेज भागे.. ये आईडिया आजमाने में कोई बुराई नहीं थी.. स्पोर्टस वाली शॉप पर गये और तरह तरह की बॉल देखी... फुटबाल या बॉलिबॉल नहीं ली क्योंकि वो चमडे़ की थी और शायद मेरे दांतों के वार नहीं सह सके...:) तो पापा को पसंद आई ये बास्केट बॉल..
बॉल चाहे बास्केट हो या फुटबाल मुझे क्या फर्क पड़ने वाला था... मैं तो इसे किक भी मार सकता हूँ और उठा कर घूम भी सकता हूँ..
और ये ज्यादा भागती नहीं.... मैं जीतना दम लगाता हूँ उसी तरह बस... तो ये मेरे कंट्रोल में रहती है...
बस अब कहीं बास्केट दिख जाये...
नहीं तो कोई बात नहीं... नया पेले तैयार हो रहा है.. क्या ख्याल है आपका....
मुमेंट ऑफ द डे कल पापा सुबह ऑफिस जाने के लिये तैयार हो रहे थे... मुडे़ पर बैठ जुते पहन रहे थे... तैयार तो मैं भी था पर जुते नहीं पहने थे... पापा को जुते पहनते देख आ गया पापा के पास और उनके जुतों में अपने पैर आजमाने लगा.. बडे़ थे तो क्या, ट्राई करने में क्या हर्ज है... :) |
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June 12, 2009 at 8:12 PM
आज तो पुरे बास्केट बॉल के खिलाडी लग रहे हो | (पूत के पांव पालने में ही नजर आ रहे है |)
June 12, 2009 at 10:44 PM
आदि गुरु छाते जा रहे हो?:)
रामराम.
June 12, 2009 at 11:31 PM
ये पीली पीली गेंद ...भाई बहुत कुछ समझने लगे है ..... बड़े हो गए है आप ..... दुनियादारी की समझ जल्दी ही आयेगी . उम्दा सब कुछ उम्दा
June 12, 2009 at 11:59 PM
bachche kitne samajhdar ho gaye hai
June 13, 2009 at 12:26 AM
शाबश बेटे, बास्केट बाल से खुब खेलो .
प्यार ओर बहुत सा प्यार
June 13, 2009 at 4:59 AM
लगता है बड़े होकर खिलाड़ी बनने का इरादा है।
बॉल के साथ सुन्दर लग रहे हो।
June 13, 2009 at 7:48 PM
मारूं हरकतें कर डालीं!
June 13, 2009 at 8:01 PM
पापा के जूतों में पैर घुसाने का काम तो बच्चों का शौक होता है . कई तो पैर घुसाकर चिल्लाते है कि मैं पापा बन गया :)
June 14, 2009 at 3:11 AM
देख लो..कहीं कोई कटोरी जैसी डाईनिंग टेबल पर दिखे तो उसी को बास्केट मान कर बॉल फेंको..ज्यादा ऊँची भी नहीं है.. :)
फिर मम्मी पापा बतायेंगे कि बास्केट हुआ कि नहीं. :)
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