कल मेरे ब्लोग पर रतन अंकल के कमेंट्स का सैकड़ा पुरा हुआ..
थेक्यु रतन अंकल!!
शरारत ऑफ द डे कल शाम पापा के साथ मार्केट घुमने गया.. समान ले पापा ने मुझे काउन्टर पर बैठाया और बिल बनवाने लगे.. और मैं काउन्टर पर बैठ सामान, मोनिटर पर अपनी निगाह और हाथ आजमा रहा था.. उस दुकान में मुरमुरे नहीं थे और पापा ने कहा कि आप पास कि दुकान से लाकर दे दो.. तो उधर से जबाब मिला कि नहीं अभी कोई आदमी नहीं है जो वहाँ से ला दे.. पापा ने कहा ठीक है आप इसे (आदि को) दो मिनिट रखो... तो उधर से सुनने को मिला.... "गोपाल...... पास से एक मुरमुरे का पैकेट लाना!!!!" अब आप बताओ मैनें काउन्टर एसा क्या किया? |
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June 14, 2009 at 6:57 PM
आदि कि शैतानी ने मुरमुरे लाने को मजबुर किया ।
पर आदि प्यारा है ।
June 14, 2009 at 7:37 PM
बेचारा, मुरमुरे वाला...हा हा!! बहुत बदमाशी चल रही है आजकल. सही है..
June 14, 2009 at 9:21 PM
दुकानदार की शामत आई थी जो तुमको बैठाता?:)
शाबास, अब रवां होने लगा है तू.
रामराम.
June 14, 2009 at 10:28 PM
are kahin dukaan vale ne "aadi" ko "rudra " to nahin samajh liya ?
June 15, 2009 at 1:28 AM
हूँ, बदमाशी भी खेल भी।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
June 15, 2009 at 1:33 AM
अरे आदि इतने बडे शारारती बन गये की गब्बर अंकल की तरह से ५० ५० कि मी तक सारे दुकान दार तुम से डरने लगे:)
ओर यह छुपा छुपी का खेल अच्छा लगा.
प्यार
June 15, 2009 at 4:56 AM
दुकानदार ने तुम्हे झेलने के बजाय मुर मुरे मंगवाना ही ज्यादा उचित समझा |
June 15, 2009 at 5:12 AM
बेटा आपने या तो मॉनिटर को पकड़ लिया या फिर बिलबुक खींचकर उसमें कुछ लिखने की कोशिश की, बेचारा दुकानदार!!
उसे आपकी शेतानी सहने से ज्यादा अच्छा लगा कि मुरमुरे मंगा दिये जायें।
वैसे छुपा-छुपी वाला खेल बहुत पसन्द आया।
जीते रहो
:)
June 15, 2009 at 9:06 AM
सवाल तो अच्छा किया आपने .... "अब आप बताओ मैनें काउन्टर एसा क्या किया?"
अब आपने एक दो चीजें तो उठाकर नीचे फेंकी ही होगीं तभी तो काउंटर वाला घबरा गया ....वैसे आपके पापा ने भी चालाकी भरा फैंसला लिया .....!!
June 18, 2009 at 10:29 AM
क्या मजाल...मुरमुरे गोपाल तो क्या, दुकान वाले का बाप भी लाकर देता...मजाक समझा है क्या.
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