शनिवार की देर शाम पापा भी पहुँच गये मुझे फिसलपट्टी पर फिसलाने के लिये... मुझे पट्टी पर खेलता देख आश्चर्य करने लगे... तुरंत मम्मी को फोन कर बोला.."बालकॉनी से देखो, आदि फिसलपट्टी पर कितना अच्छा खेल रहा है..." बालकॉनी से मुझे फिसलता देख मम्मी से नहीं रहा गया और केमरा ले नीचे आ गई..... और इन खुबसुरत पलों को कैद कर लिया खास आपके लिये...
हैण्डल को मजबुती से पकड़ धीरे धीरे नीचे आने की कौशिश...
फिसलने के बाद फिर से ऊपर जाना होता है....
अच्छे से बैठ कर फिर नीचे जाने की तैयारी...
खुद ही दम लगा कर ऊपर जाने कौशिश...
बहुत मजा आया...
याद आया बचपन? कभी फिसले है ऐसे?
May 11, 2009 at 6:10 PM
गजब ताकत आ गई है बाबू!! खूब अच्छे...संभल कर फिसलना..खूब मजे में.
May 11, 2009 at 7:25 PM
छा गये पल्टूजी आप तो. क्या मजा आता है यार इसमे तो. बहुत बीता जमाना याद करवा दिया. हमारे जमाने मे तो ये भी नही थी कोई बडे से चिकने पत्थर पर फ़िसल कर ही खुश हो लेते थे भाई.
एक बार मेरे नाम से भी फ़िसल लेना आज. मुझे तो देख कर ही मजा आरहा है.
रामराम.
May 11, 2009 at 8:42 PM
फिसलने का आनन्द अदभुत है । खूब फिसल रहे हैं आप ।
May 11, 2009 at 8:58 PM
हा हा हा हा हा हा हा ओये हीरो सच मे बचपन याद दिला दिया.......बहुत मजे कर रहे हो .....है न..
love ya
May 11, 2009 at 10:04 PM
फिसले तो हम भी है यार कहीं.. पर वो फिसल पट्टी नहीं थी... :)
जोधपुर में शास्त्री सर्किल पर बनी पत्तियों पर खूब फिसले है हम..
May 12, 2009 at 1:55 AM
:) enjoy .!!
May 12, 2009 at 7:12 AM
हमारे ज़माने में ये फिसलपट्टियाँ तो होती नहीं थी हाँ रेत के बड़े टील्ले जरुर होते थे हम तो उन टिल्लों पर ही फिसला करते थे | रेत में फिसलने का भी अलग मजा आता था |
May 12, 2009 at 7:45 AM
खूब फिसले है....हमारे छोटू रोज स्कूल से आते वक़्त दो मिनट रूककर फिसलते है...पापा लेने जाते है ...एक दो बार उनके किसी काम में बिजी होने के कारण मै गया तो पापा ने हिदायत दी....दो तीन बार फिसलने देना....जल्दबाजी मत करना...दादा -पोते की बोन्डिंग में अपुन कौन ?
May 12, 2009 at 8:16 AM
अब तो अपने बेटे को फिसला रहा हूँ:)
May 12, 2009 at 8:16 AM
sach kaha yaad aa gaya bachpan ..samhal kar fislana babu.
May 12, 2009 at 8:58 AM
वाह - फिजिक्स का पहला पाठ!
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