रोज़ देखता हूँ मम्मी, पापा और सभी को अपने आप खाते हुऐ, आज मैने भी खुद खाने की ठान ली थी, मम्मी के हाथ से चम्मच लिया और खाने लगा, मम्मी के लगा की चम्मच से मुँह में चोट लग जायेगी तो चम्मच हटा लिया.. पर मैं कहाँ रुकने वाला था, भुख भी तो जोर से लगी थी..कल तो मम्मी भी मेहरबान थी.. अपने आप खाने से नहीं रोका, पहले अपनी कटोरी खाली की, फिर मम्मी की कटोरी भी झपट ली.. और तो और हाथ में ठिक से सूजी नहीं आ रही थी तो पूरी कटोरी ही मुहँ से लगा ली..फिर क्या था, सूजी का प्याला और मैं.. खुब खाया, मुँह और कपडो़ पर लगाया, आप ही देख लिजिये कैसा मेकअप किया है?
कभी-कभी ऐसा हो तो कितना मज़ा आये! ऐसे ही तो मैं खाना सीखूंगा ना!






December 27, 2008 at 7:17 PM
पल्टू सूजी का हलवा ऐसे ही खाते रहना, आखिर जल्दी बड़ा जो होना है |
December 27, 2008 at 7:19 PM
बहुत अच्छी बात है . जल्दी जल्दी सब सीख लो . जल्दी बडे हो जाओ . हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है !
December 27, 2008 at 8:15 PM
छा गये पल्टू दादा आज तो ! घणे जोर तैं हलवा खाण लाग रे हो ..जरा ताऊ के लिये भी रखना ! :) बहुत आशिष पल्टु को !
रामराम !
December 27, 2008 at 8:56 PM
बहुत प्यारे लग रहे हो बबुवा.. :)
December 27, 2008 at 9:08 PM
बहुत खूब. होंठों पर ये क्या काली बिंदी लगा रखी है.इसे से माथे के बाईं ओर होना चाहिए.
December 28, 2008 at 12:13 AM
बोलते चित्र. वाह!
December 28, 2008 at 3:11 AM
अरे पलटू क्या स्टाईल है खाने, का मजा आ गया, चलो कल मिलते है.प्यार
December 28, 2008 at 3:46 AM
सुब्रमलियब अंकल, ये काली बिंदी नहीं, हरे धनीये का पत्ता है..
December 29, 2008 at 2:10 AM
मेरे मन को भा गए अब तुम प्रिय आदित्य,
मन करता है - आज से देखूँ तुमको नित्य!
December 29, 2008 at 9:59 PM
बहुत अच्चे .... तुम कभी एक और डीश ट्राय करना जिसे सभ पसंद करते हैं इसे मागी कहते हैं
December 29, 2008 at 10:12 PM
बहुत खूब। पर भइये, स्वाद कैसा था, ये तो बताया ही नहीं।
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