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दो बुंद ज़िन्दगी की..

आज तो मम्मी ने सुबह सुबह ही नहला दिया.. कुछ समझ नहीं आया.. इतनी जल्दी क्यों ? अभी तो पापा ओफ़ीस भी नहीं गये थे... फिर पापा और आदि साथ - साथ क्यों तैयार हो रहे थे ? थोड़ी देर में पता चली पापा मम्मी आदि को लेकर बाहर जा रहे थे.. पर मुझे पता नहीं था कि ये कोई खुश होने की बात नहीं थी..
आदि को फिर से होस्पिटल ले जाया जा रहा था.. आज आदि का टीका लगना था.. मतलब फिर से सुई उईईईई...
पहले तो मेरा वजन लिया गया, इस बार वजन था 6.3 kg . पिछले एक महीने में आधा किलो वजन बढा.. ठीक है ना ?
फ़िर वो पल आया.. नर्स दीदी इंजेक्शन तैयार कर रही थी.. उफ़ फिर से.. मै पापा कि गोदी में दुबक गया और दीदी ने सुई मेरे thigh में लगा दी.. मैं रो पड़ा.. बहुत दर्द हुआ सच में.... मम्मी ने मुझे गोद लिया और चुप कराने कोशीश कि... थोड़ी देर में मैं चुप हुआ.. अब नर्स दीदी ने मुझे मिठी दवा पिलाई... इसे ही कहते है..."दो बुंद ज़िन्दगी की"... इन सब के बाद मेरे टिकाकरण का ये चरण तो पुरा हुआ... अगला टीका तो 5 महीने बाद लगेगा..
लेकिन आज मेरे पाँव में बहुत दर्द है.. मैं बहुत परेशान हुँ.. चिन्ता नहीं करना मैं जल्द ही ठीक हो जाऊगा...
2 comments:

Comments

आदि बेटे , कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है। जीवनभर रोगमुक्त रहने के लिए टीके लगवाना जरूरी है। इस दुनिया में आए हो तो कष्ट सहने के लिए भी तैयार रहो।


टीका लगवाना तो जरुरी है. अब मीठी दवा खाओ फिर सब दर्द ठीक हो जायेगा. आदि तो अच्छा बच्चा है. डरते थोड़ी हैं सुई लगवाने से बहादुर बच्चे.


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