आदि को फिर से होस्पिटल ले जाया जा रहा था.. आज आदि का टीका लगना था.. मतलब फिर से सुई उईईईई...
फ़िर वो पल आया.. नर्स दीदी इंजेक्शन तैयार कर रही थी.. उफ़ फिर से.. मै पापा कि गोदी में दुबक गया और दीदी ने सुई मेरे thigh में लगा दी.. मैं रो पड़ा.. बहुत दर्द हुआ सच में.... मम्मी ने मुझे गोद लिया और चुप कराने कोशीश कि... थोड़ी देर में मैं चुप हुआ.. अब नर्स दीदी ने मुझे मिठी दवा पिलाई... इसे ही कहते है..."दो बुंद ज़िन्दगी की"... इन सब के बाद मेरे टिकाकरण का ये चरण तो पुरा हुआ... अगला टीका तो 5 महीने बाद लगेगा..लेकिन आज मेरे पाँव में बहुत दर्द है.. मैं बहुत परेशान हुँ.. चिन्ता नहीं करना मैं जल्द ही ठीक हो जाऊगा...

August 25, 2008 at 10:40 AM
आदि बेटे , कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है। जीवनभर रोगमुक्त रहने के लिए टीके लगवाना जरूरी है। इस दुनिया में आए हो तो कष्ट सहने के लिए भी तैयार रहो।
August 26, 2008 at 11:37 AM
टीका लगवाना तो जरुरी है. अब मीठी दवा खाओ फिर सब दर्द ठीक हो जायेगा. आदि तो अच्छा बच्चा है. डरते थोड़ी हैं सुई लगवाने से बहादुर बच्चे.
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